Logo
Home / Blog Details

हनुमान जी और राम जी की पहली मुलाकात की अद्भुत कथा! जानिए पूरी कहानी

Learn more about our blogs and news.

हनुमान जी और राम जी की पहली मुलाकात की अद्भुत कथा! जानिए पूरी कहानी
Published on October 25, 2026

प्रस्तावना: जब पहली बार मिले प्रभु श्रीराम और उनके परम भक्त हनुमान जी

जब भी सच्ची भक्ति, निस्वार्थ प्रेम और अटूट विश्वास की बात होती है, तो सबसे पहले भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण किया जाता है। हनुमान जी केवल श्रीराम के परम भक्त ही नहीं, बल्कि उनके सबसे विश्वसनीय सेवक, संकट के साथी और हर कठिन परिस्थिति में साथ निभाने वाले महान भक्त हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी और भगवान श्रीराम की पहली मुलाकात कैसे हुई थी? आखिर वह कौन-सी परिस्थिति थी, जिसने पवनपुत्र हनुमान जी को प्रभु श्रीराम के इतना करीब ला दिया? पहली बार मिलते ही हनुमान जी ने श्रीराम को कैसे पहचाना और इस मुलाकात के बाद रामायण की कहानी ने कौन-सा नया मोड़ लिया?

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में इस पहली मुलाकात का सुंदर वर्णन मिलता है। यह कथा उस समय की है, जब भगवान श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता की खोज कर रहे थे और उनके साथ छोटे भाई लक्ष्मण जी भी थे।

आइए, श्रद्धा और भक्ति के साथ जानते हैं हनुमान जी और राम जी की पहली मुलाकात की पूरी कथा, जिसकी याद आज भी भक्तों के हृदय में प्रेम और विश्वास जगाती है।

यह भी पढ़ें:- भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास से दीपावली तक की रोचक कथा!

1. भगवान श्रीराम का वनवास और माता सीता का हरण

कथा की शुरुआत भगवान श्रीराम के वनवास से होती है। अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को पिता के वचन की मर्यादा निभाने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करना पड़ा था। उनके साथ माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण जी भी वन में गए।

तीनों वन में शांतिपूर्वक अपना समय व्यतीत कर रहे थे। लेकिन एक दिन राक्षसराज रावण छलपूर्वक माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया।

जब भगवान श्रीराम को माता सीता के लापता होने का पता चला, तो वे अत्यंत व्याकुल हो उठे। वे वन के वृक्षों, लताओं, नदियों और पशु-पक्षियों से माता सीता के बारे में पूछते हुए उन्हें खोजने लगे।

लक्ष्मण जी अपने बड़े भाई के साथ हर कदम पर खड़े रहे। दोनों भाइयों ने कठिन रास्तों, घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से गुजरते हुए माता सीता की खोज जारी रखी।

इसी खोज के दौरान भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी की यात्रा उन्हें पंपा सरोवर और ऋष्यमूक पर्वत के आसपास के क्षेत्र तक ले आई। उन्हें यह पता नहीं था कि यहीं उनकी मुलाकात एक ऐसे महान भक्त से होने वाली है, जो आगे चलकर माता सीता की खोज और रावण के विरुद्ध युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

वह महान भक्त थे — पवनपुत्र हनुमान जी।

2. ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव की चिंता

उसी समय ऋष्यमूक पर्वत के आसपास वानरराज सुग्रीव अपने कुछ विश्वसनीय साथियों के साथ रह रहे थे। सुग्रीव को अपने बड़े भाई वाली से भय था। दोनों भाइयों के बीच गंभीर विवाद हो चुका था और सुग्रीव को अपना राज्य छोड़कर यहां शरण लेनी पड़ी थी।

सुग्रीव हर समय इस चिंता में रहते थे कि कहीं वाली उन्हें खोजते हुए यहां न आ जाए।

एक दिन उन्होंने दूर से दो तेजस्वी पुरुषों को अपनी ओर आते देखा। दोनों के हाथों में धनुष-बाण थे। उनका व्यक्तित्व राजसी था, शरीर बलवान था और उनके चेहरे पर अद्भुत तेज दिखाई दे रहा था।

उन्हें देखकर सुग्रीव के मन में आशंका उत्पन्न हुई।

उन्होंने सोचा, “ये दोनों कौन हैं? इनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं। कहीं इन्हें वाली ने मुझे पकड़ने के लिए तो नहीं भेजा?”

सुग्रीव भयभीत हो गए और अपने साथियों से सलाह करने लगे। वे उन दोनों अजनबियों की वास्तविक पहचान जानना चाहते थे, लेकिन स्वयं उनके पास जाने का साहस नहीं कर पा रहे थे।

तब उन्हें अपने बुद्धिमान मंत्री और परम विश्वसनीय साथी हनुमान जी की याद आई।

3. सुग्रीव ने हनुमान जी को भेजा भगवान राम का पता लगाने

सुग्रीव ने हनुमान जी को अपने पास बुलाया और उन दोनों तेजस्वी पुरुषों के बारे में बताया। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि वे किसी साधु या तपस्वी का रूप धारण करके उन दोनों के पास जाएं और पता लगाएं कि वे कौन हैं, कहां से आए हैं तथा वन में आने का उनका उद्देश्य क्या है।

हनुमान जी अपने स्वामी सुग्रीव की आज्ञा पाकर तुरंत तैयार हो गए।

वे अत्यंत बुद्धिमान, बलशाली और वाक्पटु थे। वे जानते थे कि किसी अजनबी से बातचीत करते समय विनम्रता और विवेक का कितना महत्व होता है।

हनुमान जी ने अपना वानर रूप छोड़कर एक तपस्वी या भिक्षु जैसा वेश धारण किया और ऋष्यमूक पर्वत से नीचे उतरकर उन दोनों भाइयों की ओर चल पड़े।

उन्हें उस समय यह ज्ञात नहीं था कि जिन दो पुरुषों का परिचय जानने वे जा रहे हैं, उनमें से एक स्वयं भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम हैं और दूसरा उनके प्रिय भाई लक्ष्मण जी।

यह मुलाकात केवल सुग्रीव की चिंता दूर करने का माध्यम नहीं बनने वाली थी, बल्कि हनुमान जी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना बनने वाली थी।

4. हनुमान जी और श्रीराम की पहली मुलाकात

हनुमान जी जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी के पास पहुंचे, तो उन्होंने अत्यंत विनम्रता के साथ दोनों को प्रणाम किया।

उनकी वाणी मधुर थी, शब्द स्पष्ट थे और बोलने का तरीका इतना प्रभावशाली था कि कोई भी उनकी बुद्धिमत्ता और संस्कारों से प्रभावित हो सकता था।

हनुमान जी ने दोनों भाइयों से पूछा कि वे कौन हैं और इस कठिन वन क्षेत्र में किस उद्देश्य से आए हैं। उन्होंने उनके राजसी रूप, हाथों में धनुष-बाण और तपस्वियों जैसी वेशभूषा को देखकर अपनी जिज्ञासा भी प्रकट की।

उन्होंने विनम्रता से अपना परिचय देते हुए बताया कि वे वानरराज सुग्रीव के मंत्री हैं और अपने स्वामी के निर्देश पर उनसे मिलने आए हैं।

हनुमान जी के मुख से निकले शब्दों में न तो अहंकार था और न ही किसी प्रकार की कठोरता। उनकी वाणी में सम्मान, समझदारी और सहजता थी।

भगवान श्रीराम ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनते रहे। हनुमान जी के बोलने का ढंग, उनकी भाषा पर पकड़ और उनके व्यवहार ने श्रीराम को बहुत प्रभावित किया।

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में भगवान श्रीराम हनुमान जी की वाणी की प्रशंसा करते हैं। वे लक्ष्मण जी को बताते हैं कि हनुमान जी ने अत्यंत सुंदर, संतुलित और विद्वत्तापूर्ण तरीके से अपनी बात कही है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि श्रीराम ने पहली मुलाकात में ही हनुमान जी की बुद्धि, विनम्रता और संवाद-कौशल को पहचान लिया था।

यही इस पहली मुलाकात की विशेषता थी—हनुमान जी अपनी वाणी और व्यवहार से श्रीराम के मन में सम्मान का स्थान बना चुके थे।

5. लक्ष्मण जी ने सुनाई भगवान श्रीराम की पूरी कहानी

हनुमान जी की विनम्रता से प्रभावित होकर लक्ष्मण जी ने उन्हें दोनों भाइयों का परिचय दिया।

उन्होंने बताया कि वे अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं। बड़े भाई श्रीराम पिता के वचन का पालन करने के लिए वनवास में आए हैं। माता सीता भी उनके साथ वन में रह रही थीं, लेकिन राक्षसराज रावण उनका हरण करके ले गया है।

अब दोनों भाई माता सीता की खोज में वन-वन भटक रहे हैं।

लक्ष्मण जी ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि माता सीता का पता लगाना है। वे ऐसे सहयोगी की तलाश में हैं, जो उनकी खोज में सहायता कर सके।

हनुमान जी ने जब भगवान श्रीराम की यह व्यथा सुनी, तो वे समझ गए कि उनके सामने खड़े ये दोनों पुरुष साधारण यात्री नहीं हैं। वे धर्म और मर्यादा के मार्ग पर चलने वाले महान पुरुष हैं, जो कठिन परिस्थिति में भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे हैं।

हनुमान जी ने महसूस किया कि सुग्रीव और श्रीराम की मुलाकात दोनों के लिए उपयोगी हो सकती है। सुग्रीव स्वयं संकट में थे और उन्हें एक शक्तिशाली सहयोगी की आवश्यकता थी। दूसरी ओर, श्रीराम को माता सीता की खोज में सहायता चाहिए थी।

इस प्रकार हनुमान जी ने दोनों के बीच मित्रता का मार्ग देखा।

6. हनुमान जी ने श्रीराम को पहचान लिया

हनुमान जी की पहली मुलाकात का सबसे भावपूर्ण पक्ष उनकी भक्ति से जुड़ा है।

रामायण के वर्णन में हनुमान जी पहले सुग्रीव के दूत और मंत्री के रूप में श्रीराम के पास आते हैं। वे बातचीत के दौरान दोनों भाइयों की पहचान और उनके उद्देश्य को समझते हैं। बाद की भक्ति परंपराओं में इस प्रसंग को हनुमान जी द्वारा अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को पहचान लेने के रूप में अत्यंत भावपूर्ण ढंग से याद किया जाता है।

कल्पना कीजिए, एक ओर भगवान श्रीराम हैं, जो अपनी प्रिय पत्नी की खोज में कठिनाइयों से गुजर रहे हैं, और दूसरी ओर हनुमान जी हैं, जिनका जीवन आगे चलकर प्रभु की सेवा में समर्पित होने वाला है।

हनुमान जी ने श्रीराम के सामने अपनी विनम्रता बनाए रखी। उन्होंने अपने बल, ज्ञान या पद का प्रदर्शन नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने दोनों भाइयों की सहायता करने का अवसर खोजा।

सच्चे भक्त की पहचान भी यही है। वह केवल अपने आराध्य की स्तुति नहीं करता, बल्कि उनके उद्देश्य को अपना उद्देश्य बना लेता है।

इसी भाव ने आगे चलकर हनुमान जी को रामभक्ति का सर्वोच्च उदाहरण बना दिया।

7. हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण जी को सुग्रीव के पास पहुंचाया

जब हनुमान जी को विश्वास हो गया कि दोनों भाई सुग्रीव के शत्रु नहीं हैं, तो उन्होंने अपना वास्तविक परिचय बताया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वे पवनदेव के पुत्र हनुमान हैं और वानरराज सुग्रीव के मंत्री हैं। सुग्रीव उनसे मित्रता करना चाहते हैं और दोनों भाइयों से मिलकर अपनी परिस्थिति बताना चाहते हैं।

हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण जी को सुग्रीव से मिलने के लिए आमंत्रित किया।

इसके बाद वे दोनों भाइयों को अपने साथ लेकर सुग्रीव के पास पहुंचे। इस प्रकार पहली मुलाकात के बाद हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव के बीच संपर्क स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब सुग्रीव और श्रीराम मिले, तो दोनों ने एक-दूसरे की परिस्थिति समझी। सुग्रीव ने अपने भाई वाली से हुए विवाद और अपने कष्टों के बारे में बताया। श्रीराम ने भी माता सीता के हरण और उनकी खोज की बात कही।

दोनों को एहसास हुआ कि वे एक-दूसरे की सहायता कर सकते हैं।

8. श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता ने बदली रामायण की दिशा

हनुमान जी की समझदारी और प्रयासों से भगवान श्रीराम और सुग्रीव के बीच मित्रता स्थापित हुई। दोनों ने एक-दूसरे की सहायता करने का वचन दिया।

श्रीराम ने सुग्रीव की समस्या दूर करने में सहायता करने का आश्वासन दिया, जबकि सुग्रीव ने माता सीता की खोज में अपने वानर साथियों की सहायता देने का वचन दिया।

आगे चलकर श्रीराम ने सुग्रीव को उसका अधिकार वापस दिलाने में सहायता की। इसके बाद सुग्रीव ने वानर सेना को माता सीता की खोज के लिए अलग-अलग दिशाओं में भेजा।

दक्षिण दिशा में जाने वाले दल में हनुमान जी भी शामिल थे। जब उन्हें माता सीता के लंका में होने का पता चला, तब उन्होंने समुद्र पार करके लंका जाने का महान कार्य किया।

लंका पहुंचकर हनुमान जी ने अशोक वाटिका में माता सीता को खोजा और उन्हें भगवान श्रीराम का संदेश दिया। इसके बाद वे वापस लौटे और माता सीता के बारे में श्रीराम को जानकारी दी।

इस प्रकार पहली मुलाकात में शुरू हुआ परिचय धीरे-धीरे एक ऐसी भक्ति और सेवा की यात्रा में बदल गया, जिसने रामायण की आगे की घटनाओं में निर्णायक भूमिका निभाई।

यदि उस दिन हनुमान जी सुग्रीव की आज्ञा मानकर श्रीराम से मिलने न गए होते, तो श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता का मार्ग इतनी सहजता से नहीं खुलता। हनुमान जी ने अपनी बुद्धि, विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा से दो महान उद्देश्यों को एक सूत्र में जोड़ दिया।

9. श्रीराम और हनुमान जी के रिश्ते की शुरुआत

हनुमान जी और भगवान श्रीराम का संबंध केवल परिचय या मित्रता तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ यह प्रभु और भक्त, आराध्य और सेवक के अटूट रिश्ते का प्रतीक बन गया।

हनुमान जी ने अपने हर कार्य में श्रीराम की सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया। चाहे माता सीता की खोज हो, लंका में प्रवेश करना हो, रावण के दरबार में निर्भय होकर संदेश देना हो या युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी बूटी लाना—हर परिस्थिति में हनुमान जी ने अपने समर्पण और साहस का परिचय दिया।

उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सच्ची भक्ति केवल शब्दों से व्यक्त नहीं होती। वह सेवा, साहस, त्याग और कठिन समय में साथ निभाने से प्रकट होती है।

हनुमान जी के पास अपार शक्ति थी, लेकिन उन्होंने कभी उस शक्ति का उपयोग अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए नहीं किया। उन्होंने अपनी सभी क्षमताओं को प्रभु श्रीराम के कार्य में लगा दिया।

इसीलिए आज भी जब कोई व्यक्ति संकट में होता है, तो वह श्रद्धा से हनुमान जी को याद करता है। भक्तों के लिए हनुमान जी शक्ति, साहस, निष्ठा और अटूट रामभक्ति के प्रतीक हैं।

10. हनुमान जी और श्रीराम की पहली मुलाकात से मिलने वाली सीख

हनुमान जी और श्रीराम की पहली मुलाकात केवल एक धार्मिक कथा नहीं है। इसमें जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश छिपे हैं।

विनम्रता इंसान को महान बनाती है

हनुमान जी शक्तिशाली होने के साथ-साथ अत्यंत विनम्र भी थे। उन्होंने श्रीराम से बात करते समय सम्मान और मधुरता का परिचय दिया। इससे सीख मिलती है कि वास्तविक महानता केवल शक्ति में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देती है।

सही समय पर लिया गया निर्णय बड़ा बदलाव ला सकता है

हनुमान जी ने परिस्थिति को समझा और श्रीराम तथा सुग्रीव को मिलवाया। उनके इस निर्णय ने आगे की घटनाओं का रास्ता खोल दिया। जीवन में समझदारी से उठाया गया एक कदम कई लोगों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकता है।

सच्ची भक्ति सेवा में दिखाई देती है

हनुमान जी ने श्रीराम के प्रति अपना समर्पण केवल शब्दों में व्यक्त नहीं किया। उन्होंने हर कठिन परिस्थिति में कार्य करके दिखाया। इससे सीख मिलती है कि प्रेम और श्रद्धा का सबसे सुंदर रूप निस्वार्थ सेवा है।

संकट के समय धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए

श्रीराम माता सीता के वियोग में दुखी थे, लेकिन उन्होंने खोज और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ा। हनुमान जी ने भी अपने विवेक और साहस से समाधान खोजने में सहायता की। कठिन समय में धैर्य, विश्वास और सही प्रयास बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की सहायता के लिए करें

हनुमान जी की शक्ति का उद्देश्य दूसरों पर प्रभाव जमाना नहीं, बल्कि प्रभु के कार्य और जरूरतमंदों की सहायता करना था। यही संदेश हमें अपने जीवन में भी अपनाना चाहिए।

यह भी पढ़ें:- राम जी के जीवन का यह पारिवारिक रहस्य आपको हैरान कर देगा!

निष्कर्ष: पहली मुलाकात से शुरू हुई अमर रामभक्ति

हनुमान जी और राम जी की पहली मुलाकात की अद्भुत कथा हमें बताती है कि कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी शुरुआत एक छोटी-सी भेंट से होती है। ऋष्यमूक पर्वत के पास हुई यह मुलाकात आगे चलकर रामायण की महत्वपूर्ण घटनाओं का आधार बनी।

सुग्रीव की चिंता दूर करने के लिए निकले हनुमान जी ने भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी से भेंट की, उनकी परिस्थिति को समझा और उन्हें सुग्रीव से मिलवाया। इसी के बाद श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता स्थापित हुई और माता सीता की खोज के लिए एक नया मार्ग खुला।

हनुमान जी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा भक्त वही है, जो अपने आराध्य के प्रति प्रेम को अपने कर्मों में उतारता है। उनका साहस, ज्ञान, विनम्रता और समर्पण आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देता है।

जब भी हम हनुमान जी का स्मरण करते हैं, तो हमें उनकी रामभक्ति के साथ-साथ उनके सेवा भाव को भी अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए।

आइए, इस पावन कथा से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में सत्य, विनम्रता, सेवा और निस्वार्थ प्रेम को स्थान दें।

जय श्रीराम! जय बजरंगबली!

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. हनुमान जी और भगवान श्रीराम की पहली मुलाकात कहां हुई थी?

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड के अनुसार, हनुमान जी की पहली मुलाकात भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी से ऋष्यमूक पर्वत के आसपास हुई थी। वे वानरराज सुग्रीव के मंत्री के रूप में दोनों भाइयों का परिचय जानने पहुंचे थे।

2. हनुमान जी पहली बार श्रीराम से किस रूप में मिले थे?

हनुमान जी ने सुग्रीव की आज्ञा से अपना वानर रूप छोड़कर एक तपस्वी या भिक्षु जैसा वेश धारण किया था। उन्होंने विनम्रता से श्रीराम और लक्ष्मण जी से बातचीत की और उनके आने का उद्देश्य पूछा।

3. हनुमान जी ने भगवान श्रीराम को पहली बार क्यों खोजा था?

सुग्रीव ने दो अजनबी धनुर्धारियों को अपनी ओर आते देखकर आशंका जताई थी। उन्होंने हनुमान जी को उनकी पहचान और उद्देश्य जानने के लिए भेजा था। इसी कार्य के दौरान हनुमान जी की श्रीराम से पहली मुलाकात हुई।

4. हनुमान जी और श्रीराम की पहली मुलाकात में क्या हुआ था?

हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण जी से विनम्रता से बातचीत की। लक्ष्मण जी ने उन्हें वनवास और माता सीता के हरण की घटना बताई। इसके बाद हनुमान जी ने दोनों भाइयों को सुग्रीव से मिलने के लिए आमंत्रित किया।

5. हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता कैसे करवाई?

हनुमान जी दोनों पक्षों की परिस्थितियों को समझते थे। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण जी को सुग्रीव के पास पहुंचाया। वहां दोनों ने अपनी समस्याएं साझा कीं और एक-दूसरे की सहायता करने का वचन दिया।

6. हनुमान जी भगवान श्रीराम के परम भक्त कैसे बने?

रामायण में हनुमान जी का चरित्र प्रभु श्रीराम के प्रति समर्पण, सेवा और निष्ठा का महान उदाहरण है। माता सीता की खोज से लेकर लंका में उनके संदेश पहुंचाने और युद्ध में सहायता करने तक, हनुमान जी ने हर कार्य में रामभक्ति का परिचय दिया।

7. हनुमान जी और श्रीराम की पहली मुलाकात से क्या सीख मिलती है?

इस कथा से विनम्रता, बुद्धिमत्ता, विश्वास, निस्वार्थ सेवा और संकट में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है। यह बताती है कि अपनी क्षमता का उपयोग दूसरों की सहायता और अच्छे कार्यों के लिए करना चाहिए।

8. हनुमान जी और श्रीराम की पहली मुलाकात का वर्णन किस ग्रंथ में मिलता है?

इस मुलाकात का वर्णन वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में मिलता है। विशेष रूप से किष्किंधा कांड के सर्ग 2 से 4 में सुग्रीव की आशंका, हनुमान जी का भेष बदलकर जाना, श्रीराम से बातचीत और सुग्रीव से मिलवाने की घटनाएं आती हैं।